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कविताएं

सब चख लो मिट्टी.. नहीं मिलेगी करोड़ों में छू लो पानी .. लुप्त हो रहा है। भर लो हवा फेफड़ो में..  खुश्क हो जा रही है दुनिया… ख्वाहिशों के जंगल हैं, एमेजोन से गहरे.. सूरज की किरण, नहीं पहुंचती यहां तक.. एक दूसरे की तरफ पीठ है,  पर एक दूसरे पर बैठने की जिद भी, समंदर बढ़ता जा रहा है लबालब. कंटीले तारों से घिरी रेतिली जमीन पर सुस्ताने को कोई तैयार नहीं.. यहां से भी दिखते हैं तारे.. टिमटिमाते बेहद खूबसूरत ढ़ेर सारे.. पर बेकार हैं, रंगीन पसीने के आगे फीके… भरे अगर आंगन में धुंआ.. जिसमें दिखे सब धुंधला-उजाला-सफेद भागेंगे सभी भौकेंगे ..दुबकेंगे बिल्लियों की तरह.. लेकिन बाहर सुनामी में धुल चुका होगा  सब.. सब कुछ -सुजाता शुक्ल